Directive Principle Of State

राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत | Directive Policy Of State

India Polity

राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत

Directive Principle Of State

परिचय

भारत में नीति निर्देशक तत्व और मूल अधिकार की उत्पत्ति नेहरू रिपोर्ट, 1928 को माना जाता है। नेहरू रिपोर्ट,1928 में स्वराज- संविधान की स्थापना की गई थी जिसमें कुछ मूल अधिकार को शामिल किया गया था। इसके बाद सप्रू रिपोर्ट, 1945 में दो तरह के मूल अधिकार का वर्णन किया गया था। एक जो न्यायालय में Enforceable हो, दूसरा जो न्यायालय में Unenforceable हो। जो न्यायालय में Enforceable हो वह अधिकार मूल अधिकार का रूप था तथा जो न्यायालय में Unenforceable हो वह नीति निर्देशक तत्व का रूप माना जाता है। इसी तरह संविधान सभा के सलाहकार बीएन राव ने भी संविधान सभा में दो तरह के मूल अधिकारों का को रखने का सलाह दिया था उसमे एक Emforceable हो और Unemforceable हो।

Instrument Of Instructions

Directive Principle Of State को संविधान में आयरलैंड की संविधान से प्रेरणा लेकर डाला गया है। आयरलैंड ने नीति निर्देशक तत्व को स्पेनिश संविधान से लिया था। वास्तव में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत भारत सरकार अधिनियम, 1935 में शामिल अनुदेश-प्रपत्र (Instrument Of Instructions) है। यह प्रपत्र 1935 के अधिनियम के तहत ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत के गवर्नर जनरल और प्रांतों के गवर्नर ओं को जारी किया गया था।

नीति निर्देशक तत्व के महत्व

1. यह संविधान की प्रस्तावना में दिए हुए उद्देश्यों की पूर्ति करने में सहायता करता है।

2. यह सरकार को नीति-निर्माण में मार्गदर्शन करता है।

3. यह जनता को सरकार के कार्यों का मूल्यांकन करने का आधार प्रदान करता है।

संविधान में स्थिति

राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत का वर्णन भारतीय संविधान के भाग 4 में (अनुच्छेद 36 से 51) में किया गया है। नीति निर्देशक तत्व को आयरलैंड की संविधान से लिया गया है। इसे किसी भी न्यायालय में मौलिक अधिकार की तरह चुनौती नहीं दी जा सकती है। संविधान में कुल 17 नीति निर्देशक तत्व है।

नीति निर्देशक तत्त्व के अनुच्छेद

नीति निर्देशक तत्वों को संशोधित किया जा सकता है लेकिन इसके संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में Special Majority (2/3) होना जरूरी है।

अनुच्छेद 36 (Defination Of State) – इस अनुच्छेद में राज्य (State) की परिभाषा दिया गया है। इस अनुच्छेद के आधार पर निम्न संस्थाओं को राज्य माना गया है: –

1. Parliament

2. Governor Of India

3. All State Legislature

4. All State Government

3. Local Authority within the territory Of India – जैसे डिस्ट्रिक्ट बोर्ड, मुंसिपल कॉरपोरेशन ग्राम पंचायत इत्यादि

4. Other Authority Inculding Out Of Country- ऐसे हो Authority जो राज्य के नियंत्रण में हो।

अनुच्छेद 37 (Extent Of Enfoceablity) – इस अनुच्छेद में यह घोषणा की गई है कि राज्य के नीति निर्देशक तत्व किसी भी न्यायालय में Enforceable नही होंगे, लेकीन यह एक मौलिक तत्व है। राज्य की यह जिम्मेदारी होगी की नीति बनाते समय नीति निर्देशक तत्वों को शामिल करना करे।

अनुच्छेद 38 (Social Order For Welfare)- राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए ऐसा सामाजिक व्यवस्था बनाएगा जिससे नागरिक को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय मिलेगा।

Note:- भारतीय संविधान में सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय का प्रावधान नीति निदेशक तत्व के अलावा संविधान की प्रस्तावना में भी है। अतः हम कह सकते हैं कि राज्य के नीति निदेशक तत्व 3 तरह के न्याय की वकालत करता है सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक।

अनुच्छेद 39 (Principles Of Policy to be followed bystate)- इस अनुच्छेद में राजीव को यह बताया गया है कि नीति निर्माण करते समय निम्न बातों का ध्यान रखेगा जिससे:-

a) पुरुष तथा स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो।

b) संसाधनों का उचित प्रबंधन और वितरण करे जिससे सभी नागरिकों का भला हो।

c) आर्थिक व्यवस्था का संचालन इस तरह करें की धन और उत्पादन-साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी ना हो।

d) स्त्री- पुरुष दोनो के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन की व्यवस्था हो।

e) पुरुष तथा स्त्री श्रमिकों का स्वास्थ्य और शक्ति पर कोई दुष्प्रभाव ना पड़े तथा नाबालिक बच्चो का दुरुपयोग ना हो। तथा आर्थिक आवश्यकताओं को पूर्ति करने के लिए ऐसा काम ना करें जिससे उसके शक्ति और आयु के अनुकूल ना हो।

f) बालकों को स्वस्थ वातावरण में स्वास्थ्य विकास का मौका और सुविधाएं मिले।

Note- 39 (f) को 42वां संविधान संशोधन 1972 में जोड़ा गया था।

अनुच्छेद 39 A (Equal Justice & Free Legal Aid) – 🐬राज्य सबके लिए समान न्याय की व्यवस्था करेगा।

🐬 राज्य जरूरतमंद व्यक्ति को को निशुल्क विधिक सहायता प्रदान करेगा।

NALSA

इसी को ध्यान में रखते हुए NALSA (National Legal Service Authorities Act, 1987 लाया गया। किस एक्ट के तहत 1995 में NALSA (National Legal Service Authority Of India) की स्थापना की गई। इस इकाई का मुख्य कार्य है जरूरतमंद लोगों को (जिसका उल्लेख अनुच्छेद 12 में है) निशुल्क कानूनी सहायता प्रदान करना तथा लोक अदालत की व्यवस्था करना ताकि विवादों का तीव्रतम निपटारा हो सके। इसका मुख्यालय दिल्ली में अवस्थित है। राज्य और जिला लेवल पर इसके अधीनस्थ SLSA और DLSA सा की स्थापना की गई है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश इस के संरक्षक होते हैं तथा इसके चैयरमैन सुप्रीम कोर्ट के द्वितीय वरिष्ठ जज होते हैं।

अनुच्छेद 40 (Formation Of Panchayat System)

राज्य ग्राम पंचायतो को स्वशासन की इकाई के रूप में संगठित करने के लिए कदम उठाएगा।

Note:- संविधान संशोधन, 1993 के तहत पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक अंग बना कर राज्य ने इस जिम्मेदारी को पूरा किया है।

अनुच्छेद 41(Right to work, Education etc)

राज्य कुछ दशाओं में नागरिकों (बुढ़ापा, विकलांगता, बेरोजगारी और बीमारी) के काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार सुनिश्चित करेगा

अनुच्छेद 42 (Just & Humane Condition Of Work &, Maternity Relief)

राज्य काम की न्याय संगत और मानव चित्र दशाओं को सुनिश्चित करेगा तथा प्रसूति सहायता का प्रावधान करेगा।

Note:- किस अनुच्छेद को सफल बनाने के लिए प्रसूति असुविधा अधिनियम,1961 (Maternity Benifit Act) तथा समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 (Equal Remuneration Act,1976) बनाया गया है। कुछ अन्य अधिनियम जो भारत के श्रमिकों को सुरक्षा प्रदान करता है: –

🏏 कर्मकार प्रतिकार अधिनियम, 1923 (Workmen’s Protection Act, 1923)

🏏 व्यवसाय संघ अधिनियम, 1926 (Trade Unions Act, 1926)

🏏 मजदूरी संदाय अधिनियम 1936 (Payment Of Wages Act, 1936)

🏏 न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 (Minimum Wages Act, 1948)

🏏 औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 ( Industrial Dispute Act, 1947)

🏏 कारखाना अधिनियम, 1948 (Factories A, 1948)

🏏 खान अधिनियम, 1952 (Mines Act,1952)

🏏 बोनस संदाय अधिनियम, 1965 (Payment Of Bonus Act, 1965)

🏏 ठेका श्रम (विनियमन और उत्सादन) अधिनियम, 1970 Contract Labour (Regulation & Abolition) Act, 1970

🏏 बंधित श्रम पद्धति (उत्सादन) अधिनियम, 1976 Bonded Labour System (Prohibition) Act 1976

🏏 बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम,1986 Child Labour (Prohibition & Regulation Act, 1986

🏏 वर्ष 2006 में सरकार ने बाल श्रम पर प्रतिबंध लगाया।

अनुच्छेद 43 (Protection Of Workers) – राज्य ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 43A (Participation Of Worker) – राज्य उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करेगा।

अनुच्छेद 43B (Co-Operative Society)- राज्य सहकारी समितियों के विकास के लिए प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 44 (Uniform Civil Code)

राज्य, भारत के नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता बनाने का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 45(Education & Care till 6 Years age)

86वें संविधान संशोधन, 2002 में के द्वारा मूल संविधान में लिखे गए कथावस्तु का परिवर्तन करके यह कर दिया गया है:- राज्य सभी बच्चों के 6 साल पूरा होने तक प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा का प्रबंध करेगा।

Note:- मूल संविधान में पहले किस अनुच्छेद में यह लिखा था कि राज्य सभी बालकों को 14 वर्ष की आयु पूरी करने तक निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेगा। 86वें संविधान संशोधन के द्वारा इस उपबंध को मौलिक अधिकार के अंतर्गत लाया गया तथा इसके लिए अनुच्छेद 21A को जोड़ा गया।

21A – राज्य 6 से 14 वर्ष की आयु के समस्त बच्चों को ऐसे ढंग से जैसा कि राज्य, विधि द्वारा अवधारित करें, निशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध करेगा।

अनुच्छेद 46 (Protection Of Weaker Section)

राज्य दुर्बल वर्गों विशेषकर (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति) के शिक्षा तथा अर्थ-संबंधी हितों की अभिवृद्धि करने का प्रयास करेगा।

Note:- इस नीति को संवैधानिक आकार देने के लिए 65वां संविधान संशोधन 1990 के द्वारा National Commission For SC & ST की स्थापना की गई। जिसे 79वां संविधान संशोधन, 2003 में दो भागों में बांट कर के National Commission For SC और National Commission For ST बनाया गया।

अनुच्छेद 47 (Nutrition, Public health, Standard of living & Prohibition

🐬 राज्य अपने नागरिकों की पोषण स्तर और जीवन स्तर को ऊपर उठाने का प्रयास करेगा

🐬 राज्य मादक और हानिकारक पदार्थों का निषेध का प्रयास करेगा

🐬 राज्य सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करने का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 48 (Protection From Cow Slaughter & Scientific Agriculture)

🐬 राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से संगठित करने का प्रयास करेगा।

🐬 गायों, बछड़ों और दूध देने वाली मवेशियों तथा वाहक पशुओं की रक्षा तथा नस्लों के परिरक्षण और सुधार के लिए और उनके वध को रोकने के लिए उचित कदम उठाएगा।

अनुच्छेद 48A (Protection Of Environment & Wildlife)- राज्य, देश के पर्यावरण की सुरक्षा तथा उसमें सुधार करने का और वन तथा वन्यजीवों की रक्षा करने का प्रयास करेगा।

Note:- इस अनुच्छेद को आकार देने के लिए वन्य जीव (संरक्षण), अधिनियम 1972, वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 बनाया गया है।

अनुच्छेद 49(Protection Of Historical Sites)

राज्य राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों, स्थानों एवं वस्तुओं के संरक्षण का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 50 (Separation Of Judiciary)

राज्य कार्यपालिका और न्यायपालिका के पृथक्करण का प्रयास करेगा।

अनुच्छेद 51(International Relations)

🐬 राज्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि का प्रयास करेगा।

🐬 राज्य अन्य राष्ट्रों के साथ न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखेगा।

🐬 अंतरराष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का प्रयास करेगा।

संविधान के अन्य भागों में दिए गए निर्देशक तत्व

1. अनुच्छेद 350 A – राज्य प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा देने का प्रयास करेगा।

2. अनुच्छेद 351 – राज्य हिंदी भाषा को प्रोत्साहित करेगा।

3. अनुच्छेद 335 – राज्य सेवाओं और पदों के नियुक्तियां करते समय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का ध्यान रखेगा।

नीति निर्देशक तत्व में संशोधन

अब तक नीति निदेशक तत्व में 4 संशोधन हो चुके हैं 42th ,44th, 86th और 97th।

42th संविधान संशोधन, 1976 – संशोधन के अंतर्गत अनुच्छेद 39A, 39(f) 53A और 48A को जोड़ा गया।

44th संविधान संशोधन – इस संविधान संशोधन के तहत अनुच्छेद 368 को बदला गया।

86th संविधान संशोधन – इस संविधान संशोधन में अनुच्छेद 45 को बदला गया।

97th संविधान संशोधन, 2011- इसके द्वारा सहकारी समितियों के प्रचार के संबंध में एक नया अनुच्छेद 43B को जोड़ा गया।

नीति निदेशक तत्व के सिद्धांत

नीति निर्देशक तत्व को उनके वैचारिक स्रोत और उद्देश्यों के आधार पर तीन भागों में वर्गीकृत किया जाता है: –

समाजवादी सिद्धांत (Socialistic Principles) – अनुच्छेद 38, 39, 41, 42, 43, 43A और 47 समाजवादी सिद्धांत के अंतर्गत आता है।

गांधीवादी सिद्धांत (Gandhian Principles) – अनुच्छेद 40, 43, 43B, 46, 47 और 48 गांधीवादी सिद्धांत के अंतर्गत आते हैं।

उदार-बौद्धिक सिद्धांत (Liberal-Intellectual Principles)- अनुच्छेद 44, 45, 48, 48A, 49, 50 और 51 उदार-बौद्धिक सद्धांत के अंतर्गत आते हैं।

Directive Principle Of Stateके ऊपर कथन

KT Shah – राज्य के नीति निर्देशक तत्व एक ऐसा चेक है जो बैंक की सुविधा अनुसार अदा की जाएगी।

Note:- के टी शाह को ही राष्ट्रपति चुनाव में हराकर डॉ राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने थे। इन्होंने संविधान का Amendment कराकर धर्मनिरपेक्षता (एस) शब्द को जोड़ने की दो बार कोशिश की थी जिसे डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने दोनों बार नकार दिया था।

भीमराव अंबेडकर – नीति निर्देशक तत्व का उद्देश्य आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करना है जो राजनीतिक लोकतंत्र से भिन्न है।

बी एन राव – इन्होंने नीति निर्देशक तत्व को नैतिक उपदेश माना है।

ग्रेनविल ऑस्टिन- इसने नीति निर्देशक तत्व सामाजिक क्रांति का दस्तावेज कहा है। इसने ही नीति निर्देशक तत्व को भारत की संविधान की आत्मा भी कहा है।

आइवर जेनिंग- इसने नीति निर्देशक तत्व को पुण्य आत्माओं का महत्व कांक्षा माना है।

के सी व्यहियर – इन्होंने नीति निर्देशक तत्व को “उद्देश्यों और आकांक्षाओं का घोषणा पत्र” कहा है।

Supermacy Of Directive Principle Over Fundamental Right

🐬 केसवानंद भारती VS केरल राज्य वाद, 1973 इस वाद में मौलिक अधिकार को नीति निर्देशक तत्व से श्रेष्ठ बताया गया। और यह कहा गया कि मौलिक अधिकार का हनन, नीति निर्देशक तत्व लागू करने के लिए नही किया जा सकता है।

🐬 42वां संविधान संशोधन, 1976 इसमें यह निर्णय लिया गया कि राज्य के नीति निर्देशक तत्व श्रेष्ठ है और इसे लागू करने के लिए कुछ मौलिक अधिकार का हनन किया जा सकता है।

🐬 मिनर्वा मिल्स लिमिटेड VS भारत संघ वाद, 1980 इस वार्ड में यह निर्णय लिया गया कि मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व दोनों ही महत्वपूर्ण है तथा लोकतंत्र का सही संचालन के लिए इन दोनों के बीच तालमेल रखा जाना चाहिए।

Note:- इंदिरा गांधी ने समाजवादी सिद्धांत को मजबूती देने के लिए 25वीं संविधान संशोधन, 1971 के द्वारा अनुच्छेद 31C को जोड़ा जिसके तहत अनुच्छेद 39B और 39C को लागू करते समय मौलिक अधिकार अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19 (मौलिक अधिकार) का उल्लंघन नहीं माना जाएगा।

मौलिक अधिकार और नीति निर्देशक तत्व में अंतर

Fundamental RightDirective Principle Of State
इसे संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से लिया गया है।इसे आयरलैंड के संविधान से लिया गया है
इसका वर्णन संविधान के भाग 3 में मिलता है।इसका वर्णन संविधान के भाग 4 में मिलता है।
इसे किसी भी न्यायालय में चुनौती दिया जा सकता है।इसे किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दिया जा सकता है।
यह सरकार के अधिकारों को घटाता है।यह सरकार के अधिकारों को बढ़ाता है।
यह व्यक्ति के भलाई के लिए है।यह समाज की भलाई के लिए है।
नागरिकों को जन्म से ही स्वतः प्राप्त हो जाता है।राज्य सरकार के द्वारा लागू करने के बाद ही नागरिक को नीति निदेशक तत्व की फायदा मिलती है।
मौलिक अधिकार की प्रकृति नकारात्मक है क्योंकि यह राज्य को कुछ काम करने से मना करता है।नीति निर्देशक तत्व की प्रकृति सकारात्मक है क्योंकि यह राज्य को कुछ काम करने का आदेश देता है।
सार्वभौमिक नहीं है इस पर कई प्रतिबंध लगे होते हैंकोई प्रतिबंध नहीं होता है।
यह राजनीतिक लोकतंत्र स्थापना करने का प्रयास करता है।यह सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करने का प्रयास करता है।

नीति निदेशक तत्व से संबंधित तथ्य

1. नीति निर्देशक तत्व और मौलिक अधिकार साथ साथ चलते हैं किंतु नीति निर्देशक तत्व, मौलिक अधिकार के अधीनस्थ नहीं है।

2. भारत को एक लोक कल्याणकारी राज्य इसके संविधान में वर्णित नीति निर्देशक तत्व ही बनाते हैं।

3. भाग 3 (मौलिक अधिकार) तथा भाग 4 (राज्य के नीति निर्देशक तत्व) मिलकर “संविधान की आत्मा तथा संविधान की चेतना” कहलाता है।

4. राज्य के नीति निर्देशक तत्व को आर्थिक-समाजिक अधिकार भी कहा जाता है। अतः राज्य के नीति निर्देशक तत्व में दो तरह के लोकतंत्र की स्थापना की बात की गई है आर्थिक लोकतंत्र और सामाजिक लोकतंत्र।

Directive Principle Of State

National Symobol Of India Video

https://youtu.be/iQtkTUeS2RM

1 thought on “राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत | Directive Policy Of State

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *