झारखंड के चित्रकला

JPSC PT (Arts & Culture 9) झारखंड का चित्रकला | Paintings Of Jharkhand

Jharkhand Arts & Culture

झारखंड के चित्रकला

जादो-पटिया चित्रकला

पोर्टेबल स्क्रॉल कला युगों से भारत का हिस्सा रही है और अभी भी इसके विविध क्षेत्रीय संस्करण मौजूद हैं जैसे कि उड़ीसा में पट्टचित्र, कर्नाटक में चेरियल, राजस्थान में फड़ और झारखंड में जादोपटिया। जादोपटिया चित्रकला दो शब्द जादो और पटिया से मिलकर बना है। जादो मतलब चित्र बननेवाला और पटिया का मतलब छोटे-छोटे कागज या कपड़े से बनाया हुआ चित्रफलक। यह चित्रकारी संताल और भूमिज समुदाय में काफी प्रचलित है। यह चित्रकारी संताल परगना प्रमंडल ममें बंगाल के सीमावर्ती भाग में प्रचलित है। जामताड़ा और दुमका जिला में यह चित्रकारी काफी प्रचलित है। संताल समाज के लोक-गाथाओं, सामाजिक रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और नैतिक मान्यताओं की झलक इस चित्रकला में देखने को मिलता है। इस चित्रकला की खास बात है कि जादो(चित्रकार) इस चित्रकारी को गाना गा गाकर बेचता है। इस चित्रकारी में कागज या कपड़े के छोटे-छोटे टुकड़ों को जोड़कर बनाये जाने वाले पर चित्र अंकित किया जाता है जिसमे 4 से 16 चित्र अंकित होते है।

सोहराय चित्रकला

सोहराई शब्द मुंडारी शब्द सोरोई से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘लाठी से मारना। सोहराय चित्रकारी की शुरुआत वर्षा के बाद घर के लिपाई-पुताई के क्रम में शुरू होती है। अर्थात यह फसल कटनी के समय की जाने वाली भित्ति चित्रकारी है। इस चित्रकारी की संबंध सोहराय महापर्व से है जो दीवाली के एक दिन बाद मनाई जाती है। सोहराय चित्रकला के हज़ारीबाग जिला प्रसिद्ध है। सोहराय चित्रकला और कोहबर चित्रकला को झारखंड के संदर्भ में 2020 में GI Tag मिला है। इस चित्रकला में कला के देवता प्रजापति (पशुपति भी कहा जाता है) का विशेष चित्रण मिलता है। इस चित्रकारी में पशुपति को साँड़ के पीठ में खड़ा दिखाया जाता है। पशुपति का चित्रांकन प्रायः डमरू की आकृति जैसा किया जाता है। सोहराय चित्रकारी की दो शैलियाँ है कुर्मी सोहराय और गंझु सोहराय। सोहराई पेंटिंग कई मायनों में एक रत्न है। सबसे पहले, वे माँ और बेटी के बीच एक अटूट बंधन का प्रतीक हैं। मिट्टी की दीवारों पर बनाई गई ये कलाकृतियां माताओं से बेटियों तक पहुंचती हैं। इस कला को बुलु इमाम ने 1992 से लोकप्रिय बनाया, जब उन्होंने संस्कृति संग्रहालय और आर्ट गैलरी की स्थापना की थी। 2018 में झारखंड सरकार ने ट्रेनों और सरकारी आवासों को सोहराय पेंटिंग से सजाने की योजना की घोषणा की थी।

सोहराय कला में सबसे पहले लाल रेखाएं खींची जाती हैं जो पूर्वजों या प्रजनन क्षमता को दर्शाती हैं, उसके बाद काली रेखा खींची जाती है जो भगवान शिव (पशुपतिनाथ) को दर्शाती है। अंत में, भोजन को दर्शाती हुई सफेद रेखाएं खींची जाती हैं, क्योंकि यह कला रूप फसल उत्सव से संबंधित है।

नयी दिल्ली स्थित झारखंड भवन में देश की सबसे बड़ी सोहराई पेंटिंग तैयार की गयी है। भवन के बाह्य आवरण में जमीन से लगभग 110 फीट की ऊंचाई पर 69 x 44 फीट सोहराई पेंटिंग बनायी गयी है। इसका उद्देश्य झारखंड की लोक कलाकृति से लोगों को परिचय कराना है। इस पेंटिंग को रांची के चित्रकार धनंजय कुमार व उनकी 40 कलाकारों की टीम ने 20 दिनों में तैयार किया। इस लोक कलाकृति के लिए धनंजय कुमार ने ””इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड 2024”” में अपना नाम दर्ज कराया है।

कोहबर चित्रकला

कोहबर दो शब्दों से मिलकर बना है कोह और वर। कोह का मतलब गुफा और वर का मतलब दूल्हा जिसका अर्थ होता है गुफा में दूल्हा। फलस्वरूप, यह भित्ति चित्र नवविवाहित दूल्हा-दुल्हन के घर की दीवारों पर बनाया जाता है। इस चित्रकारी को वसन्त ऋतु से वर्षा के आगमन तक बनाई जाती है मतलब जनवरी से जूम तक। इस चित्रकारी में स्त्री-पुरुष के विभिन्न संबंधों का चित्रण, प्राकृतिक परिवेश (फूल, पत्ती, पशु, पक्षी, पेड़ आदि) का चित्रण, जादू टोना का चित्रण, ज्यामितीय आकृतियों का चित्रण मिलता होता है। इस चित्रकारी का सबसे ज्यादा प्रचलन बिरहोर समुदाय में पाया जाता है। कोहबर चित्रकारी में सिकी देवी का विशेष चित्रण मिलता है। कोहबर चित्रकला एक पवित्र कला है जो उर्वरता को दर्शाती है। सबसे पहले दीवार को काली मिट्टी से ढक दिया जाता है, जो गर्भ का प्रतीक है। फिर इसे सफ़ेद मिट्टी से ढक दिया जाता है, जो शुक्राणु का प्रतीक है। मिट्टी के आधे हिस्से तक जम जाने के बाद, कंघी का इस्तेमाल करके उगती हुई माँ देवी जैसी आकृतियाँ बनाई जाती हैं। गर्भवती मोर की आकृति विवाह कक्ष के लिए सबसे शुभ प्रतीक मानी जाती है। जबकि शुभ अवसर को मनाने के लिए पशु, पक्षी, छिपकलियाँ और फूल बनाए जाते हैं।

पईतकर चित्रकला

पैतकर चित्रकला पारंपरिक भारतीय कला के सबसे पुराने रूपों में से एक है, जिसकी उत्पत्ति झारखंड के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों (कोल्हान) में हुई थी।झारखंड की यह लोक कला लोककथाओं के तत्वों के माध्यम से आदिवासी समुदाय के विश्वदृष्टिकोण, उनके उत्सव के मूड, उनकी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और दैनिक जीवन को दर्शाती है। इसमें महाभारत और रामायण की कथा को विषय के रूप में उकेरा जाता है जो स्क्रॉल कला को एक भाषा प्रदान करते हैं। इस शैली के कलाकार “चित्रकार” क्षेत्र में पाए जाने वाले कार्बनिक पदार्थों से निर्मित रंगों की एक विस्तृत श्रृंखला का उपयोग करते थे। इन जनजातीय चित्रों का उद्देश्य कहानियों, अनुष्ठानों और समारोहों का वर्णन करना है। पैतकर चित्रकला पारंपरिक रूप से पहाड़िया जनजाति और अन्य स्थानीय समुदायों द्वारा प्रचलित थी। यह शैली बंगाल और ओडिशा के कुछ क्षेत्रों में भी प्रचलित थी। इस कला रूप पर बंगाल और उड़ीसा क्षेत्र का काफी प्रभाव है क्योंकि दोनों क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक और पारंपरिक गठबंधन हैं। राजा रामचंद्र धाल ने पैतकर की चित्रकला को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पाटा चित्रकला पैतकर चित्रकला का एक अन्य रूप है जो मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल और ओडिशा में प्रचलित है।

पूर्वी सिंहभूम के धालभूमगढ़ प्रखंड के आमडुबी गाँव इस चित्रकला के प्रसिद्ध है। इस चित्रकला को विलुप्त होने से बचाने के लिए आमडुबी गाँव को “पर्यटन गाँव” घोषित किया है। इस चित्रकारी की प्रमुख विशेषता है कि यह पेड़ के छाल और पत्तियों के रस से बनाई जाती है। यह एक स्क्रॉल चित्रकला का उदाहरण है। सबर जनजातियाँ इस कल में काफी निपुण होते है।

Note:- स्क्रॉल पेंटिंग एक कला है जिसमें पेंटिंग एक स्क्रॉल पर बनाई जाती है, जो आम तौर पर कागज या रेशम का एक लंबा, रोल करने योग्य टुकड़ा होता है, और फिर देखने के लिए उसे खोल दिया जाता है।

संताल भित्ति चित्रकला

इस चित्रकला को घर के दीवालों में बनाई जाती है, इसे दीवाल चित्रण (Wall Painting) भी कहा जाता है। इस चित्रकला में ज्यामितीय चिन्हों की प्रमुखता पाई जाती है। झारखंड में भित्ति चित्रकला का व्यापक विकास हुआ है। इस चित्रकला में संताल समुदाय काफी निपुण माने जाते है। संताल समाज इस चित्रकला को अपनी पुरानी चाय-चम्पागढ़ (हजारीबाग) से जुड़ा हुआ मानते है। इस चित्रकला का ज्यादा विकास संताल परगना क्षेत्र में हुआ है हालांकि छोटानागपुर में भी यह व्यापत है। मगर छोटानागपुर और संताल परगना के भित्तिचित्र में कुछ अंतर है:-

a) संताल परगना चित्रकारी में प्राचीनता का भाव दिखता है वही छोटानागपुर चित्रकला में आधुनिकता का भाव दिखता है।

b) संताल परगना चित्रकारी में आकर की प्रधानता है वही छोटानागपुर चित्रकला में रंग की प्रधानता है।

c) संताल परगना चित्रकारी के चित्र में उभार पाए जाते है वही छोटानागपुर चित्रकला के चित्र समतल में होते है।

डब्लू सी आर्चर जो संताल परगना के डिप्टी कमिश्नर थे उन्होंने 19440 में अपनी पत्रिका “वर्टिकल मैन” में संताल समुदाय के भित्ति-चित्र का विवरण प्रस्तुत किया था।

बैद्यनाथ चित्रकला

बैद्यनाथ पेंटिंग चित्रकला शैली को विकसित करने का श्रेय चित्रकार नरेंद्र पंजियारा को जाता है। यह झारखंड में विकसित नई चित्रकला है। इस चित्रकला का विकास बैद्यनाथधाम मंदिर के परम्परानुसार उसी तरह हो रहा है जैसे कालीघाट मंदिर से कालीघाट चित्रकारी का हुआ था। इस चित्रकारी में बैद्यनाथधाम मंदिर के परम्पराओ का चित्रांकन किया जाता है जैसे:- शिव बारात, काँवर यात्रा, रूद्राभिषेक, जलाभिषेक आदि।

कुर्मी चित्रकला

उरांव, गंझु, तेली, प्रजापति, और कुर्मी कुछ स्थानीय समुदाय हैं जिन्होंने प्रागैतिहासिक प्रतिमाविज्ञान से संबंधित शैली को अपनाया है। इसमें से गंझु चित्रकारी और कुर्मी चित्रकारी ने हाल फिलहाल काफी प्रसिद्धि प्राप्त की है। इस कला में दो अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ हैं, दोनों का स्रोत क्षेत्र की रॉक कला है। एक रूप, काले और सफेद रंग में कंघी-कट स्ग्राफ़िटो शैली है, जो मुख्य रूप से दक्षिण हज़ारीबाग के गाँवों के जोराकाथ परिसर में पाया जाता है, और दूसरा एक चित्रित रूप है जो पूर्वी हज़ारीबाग के गाँवों के भेलवाड़ा परिसर में पाया जाता है। कुर्मी समुदाय झारखंड के घने वन क्षेत्रों में रहता है। धब्बेदार और धारीदार जानवर, लंबी गर्दन वाले चौपाये और कुछ दृश्यमान जीवन रूप जिन्हें भीलवाड़ा और जोराकाथ प्रांत की कुर्मी महिलाओं द्वारा अक्टूबर और नवंबर के कटाई के मौसम के दौरान अपने घर की दीवारों को चित्रित करने के लिए चुना जाता है।कोहवर और सोहराई जैसे चित्रकला में प्रयुक्त प्राकृतिक रूप से प्राप्त पीले और लाल गेरू का प्रयोग यहां भी किया गया है।

स्ट्रॉ-आर्ट चित्रकला

यह झारखंड में विकसित नई चित्रकला है। मिहिजाम (जामताड़ा) में इस चित्रकला का विकास तरुण गुहा नामक चित्रकार ने किया। ये धान के पुआल पर चित्रांकित होता है। इसमें पुआल की परत को फैलाकर ताप देकर समतल किया जाता है। फिर चित्रकार द्वारा इसपर चित्र बनाया जाता है और चित्र को काटकर अलग कर लिया जाता है। जिसे किसी रंगीली (प्रायः काली) पृष्ठभूमि में चिपकाकर मढ़ दिया जाता है।

प्रसिद्ध चित्रकार

ललित मोहन राय –दुमका के ललित मोहन राय झारखंड के प्रसिद्ध चित्रकार थे। इनके बनाये गए चित्रों को दुमका संग्रहालय, पटना संग्रहालय और संताल नृत्यकला केंद्र में संग्रहित किया गया है। दुमका में इन्होंने स्कूल ऑफ आर्ट्स की स्थापना की। 1970 में इन्हें कला श्री सम्मान मिला। 2015 में झारखंड सरकार ने इन्हें “राष्ट्रीय शिखर सम्मान” से सम्मानित किया।

हरेन ठाकुर –हरेन ठाकुर भी झारखंड के प्रसिद्ध चित्रकार है। इनका जन्म झरिया में हुआ था। इन्होंने राँची के रॉक गार्डन, राँची रेलवे स्टेशन, श्री कृष्ण पार्क (राँची) में चित्रकारी की है। इन्हें ऑल इंडिया फाइन आर्ट कैमलिन फाउंडेशन अवार्ड मिल चुका है। इनकी Water Crisis पर बनाई पेंटिंग काफी प्रसिद्ध हुई, जिसमें सूखते तालाब में मछली और कमल की दुर्गति दिखाई गई है।

महावीर महतो – यह झारखंड का उभरता हुआ भित्ति चित्रकार है।

झारखंड के चित्रकला के मुख्य तथ्य

1. झारखंड में पहला GI Tag कोहबर और सोहराय चित्रकला को मिला है।

2. 2021 में डाक विभाग द्वारा कोहबर और सोहराय चित्रकला से अंकित लिफाफा जारी किया गया।

Paintings of Jharkhand

Jado-Patia Paintingng

Portable scroll art has been a part of India for ages and still has diverse regional versions such as Pattachitra in Odisha, Cheriyal in Karnataka, Phad in Rajasthan and Jadopatia in Jharkhand. Jadopatia painting is made up of two words Jado and Patia. Jado means the painter and Patia means a canvas made of small pieces of paper or cloth. This painting is quite popular among the Santhal and Bhumij community. This painting is popular in the border areas of Bengal in the Santhal Pargana division. This painting is quite popular in Jamtara and Dumka districts. A glimpse of the folk tales, social customs, religious beliefs and moral values of the Santal society can be seen in this painting. The special thing about this painting is that Jado (painter) sells this painting by singing a song. In this type of painting, pictures are drawn by joining small pieces of paper or cloth, which contain 4 to 16 pictures.

Sohrai Painting

The word Sohrai is derived from the Mundari word Soroi, which means ‘to hit with a stick’. Sohrai painting begins during the whitewashing of the house after the rains. That is, this is a wall painting done at the time of harvesting. This painting is related to the great festival of Sohrai which is celebrated a day after Diwali. Hazaribagh district is famous for Sohrai painting. Sohrai painting and Kohbar painting have got GI Tag in 2020 in the context of Jharkhand. In this painting, a special depiction of the god of art Prajapati (also called Pashupati) is found. In this painting, Pashupati is shown standing on the back of a bull. Pashupati is usually depicted in the shape of a damru. There are two styles of Sohrai painting, Kurmi Sohrai and Ganjhu Sohrai. Sohrai painting is a gem in many ways. First of all, they symbolize an unbreakable bond between mother and daughter. These artworks created on mud walls are passed down from mothers to daughters. This art was popularized by Bulu Imam since 1992, when he founded the Sanskriti Museum and Art Gallery. In 2018, the Jharkhand government planned to decorate trains and government residences with Sohrai paintings.

In Sohrai art, first the red lines are drawn which represent ancestors or fertility, followed by black line which represents Lord Shiva (Pashupatinath). Finally, white lines are drawn depicting food, as this art form is related to harvest festivals.

The country’s largest Sohrai painting has been prepared at Jharkhand Bhawan in New Delhi. A 69 x 44 feet Sohrai painting has been made on the outer cover of the building at a height of about 110 feet from the ground. Its purpose is to introduce people to the folk art of Jharkhand. This painting was prepared by Ranchi painter Dhananjay Kumar and his team of 40 artists in 20 days. For this folk artwork, Dhananjay Kumar has registered his name in the “India Book of Records 2024”.

Kohbar Painting

Kohbar is made up of two words Koh and Var. Koh means cave and Var means groom which means groom in the cave. As a result, this mural is made on the walls of the house of the newly-wed bride and groom. This painting is made from the beginning of spring to the beginning of monsoon i.e. from January to June. In this painting, we find depiction of various relationships between man and woman, natural surroundings (flowers, leaves, animals, birds, trees etc.), depiction of witchcraft, and geometric shapes. This painting is most prevalent in the Birhor community. A special depiction of Siki Devi is found in Kohbar painting. Kohbar painting is a sacred art that depicts fertility. First, the wall is covered with black mud, which symbolizes the womb. Then, it is covered with white mud, which symbolizes the sperm. After the clay has set up to half, a comb is used to create shapes like the rising mother goddess. The shape of a pregnant peacock is considered the most auspicious symbol for the wedding hall. While animals, birds, lizards and flowers are made to celebrate the auspicious occasion.

Peitakar Painting

Paitkar painting is one of the oldest forms of traditional Indian art, which originated in the south-eastern regions of Jharkhand (Kolhan). This folk art of Jharkhand reflects the worldview of the tribal community, their festive moods, their religious beliefs, mythology and daily life through the elements of folklore. In this, the stories of Mahabharata and Ramayana are carved as subjects which provide a language to the scroll art. The artists of this style “Chitkars” used a wide range of colours made from organic materials found in the region. The purpose of these tribal paintings is to narrate stories, rituals and ceremonies. Paitkar painting was traditionally practiced by the Pahadia tribe and other local communities. This style was also prevalent in some areas of Bengal and Odisha. This art form has a great influence of Bengal and Orissa region as there are cultural and traditional ties between the two regions. Raja Ramchandra Dhal played an important role in promoting Paitkar painting. Pata painting is another form of Paitkar painting which is mainly practiced in West Bengal and Odisha.

Amdubi village of Dhalbhumgarh block of East Singhbhum is famous for this painting. To save this painting from extinction, Amdubi village has been declared a “tourist village”. The main feature of this painting is that it is made from the sap of tree bark and leaves. This is an example of a scroll painting. The Sabar tribes are quite skilled in this art.

Note:- Scroll painting is an art in which a painting is created on a scroll, usually a long, rollable piece of paper or silk, and then unrolled for viewing.

Santal Mural painting

This painting is made on the walls of the house, it is also called wall painting. Geometric symbols are prominent in this painting. Wall painting has developed extensively in Jharkhand. The Santal community is considered to be quite skilled in this painting. The Santal community considers this painting to be connected to their old tea-Champagarh (Hazaribagh). This painting has developed more in Santhal Pargana region, although it is also prevalent in Chhotanagpur. But there is some difference between the wall paintings of Chhotanagpur and Santhal Pargana:-

a) Santhal Pargana paintings show a sense of antiquity whereas Chhotanagpur paintings show a sense of modernity.

b) Santhal Pargana painting is dominated by shape whereas Chhotanagpur painting is dominated by colour.

c) Santhal Pargana paintings have raised reliefs while Chhotanagpur paintings are flat.

W.C. Archer, who was the Deputy Commissioner of Santhal Pargana, described the wall paintings of Santhal community in his magazine “Vertical Man” in 1940.

Baidyanath Painting

The credit for developing the Baidyanath Painting style goes to the painter Narendra Panjiyara. This is a new painting developed in Jharkhand. This painting is developing according to the tradition of Baidyanath Dham temple in the same way as Kalighat painting developed from Kalighat temple. In this painting, traditions of Baidyanathdham Temple are depicted like:- Shiv Baraat, Kanwar Yatra, Rudrabhishek, Jalabhishek etc.

Kurmi Sohrai Paintings

The Oraons, Ganjhus, Teli, Prajapati, and Kurmis are some of the local communities who have adopted styles related to prehistoric iconography. Of these, Ganjhu painting and Kurmi painting have gained much popularity in recent times. This art has two different manifestations, both of which have their source in the rock art of the region. One form is the comb-cut sgraffito style in black and white, found mainly in the Jorakath complex of villages in south Hazaribagh, and the other is a painted form found in the Bhelav complex of villages in east Hazaribagh.The Kurmi community lives in the dense forest areas of Jharkhand. Spotted and striped animals, long-necked quadrupeds And some of the visible life forms that are chosen by the Kurmi women of Bhilwara and Jorakat district to paint on their house walls during the harvesting season of October and November. Naturally obtained yellow and red ochre used in paintings like Kohvar and Sohrai has been used here too.

Straw-Art painting

This is a new painting developed in Jharkhand. This painting was developed by a painter named Tarun Guha in Mihijam (Jamtara). It is painted on paddy straw. In this, a layer of straw is spread and made flat by heating it. Then a painting is made on it by the artist and the painting is cut and separated. It is pasted and mounted on a colorful (usually black) background.

Famous Painter

Lalit Mohan Roy – Lalit Mohan Rai of Dumka was a famous painter of Jharkhand. His paintings are preserved in Dumka Museum, Patna Museum and Santal Nritya Kala Kendra. He established the School of Arts in Dumka. He received the Kala Shree Award in 1970. In 2015, the Jharkhand government honoured him with the “Rashtriya Shikhar Samman”.

Haren Thakur – Haren Thakur is also a famous painter of Jharkhand. He was born in Jharia. He has painted in Ranchi’s Rock Garden, Ranchi Railway Station, Shri Krishna Park (Ranchi). He has received the All India Fine Art Camelin Foundation Award. His painting on Water Crisis became quite famous, in which the plight of fish and lotus in a drying pond is shown.

Mahavir Mahato – He is an emerging mural painter from Jharkhand.

Important facts

1. Kohbar and Sohrai paintings have received the first GI Tag in Jharkhand.

2. In 2021, an envelope printed with Kohbar and Sohrai paintings was issued by the Department of Posts.

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